Monday, January 4, 2021

जानें , महाकुम्भ के बारे में लगभग सबकुछ..इतिहास, इस भव्य उत्सव का

नमस्कार,
हिन्दू संस्कृति "वसुधैव कुटुम्बकम" इस सद्वाक्य का अनुसरण करती है ..इस परंपरा के सभी पर्व पूरे विश्व को प्रेम का, एकता का पाठ पढ़ाते हैं..
हिन्दू संस्कृति की उपासना स्वकल्याण से कहीं ऊपर विश्वकल्याण को रखती है..
आप यह भाव संस्कृत के इस कथन से भी समझ सकते हैं.. 
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः । 
सर्वे भद्राणि पश्यन्ति, मा कश्चित् दुःख भाग भवेत्।। 

और विश्व कल्याण (world care) को समर्पित सदियों पुरानी एक हिन्दू परंपरा जो संपूर्ण मानव जाति को उद्धार करने का भाव रखती है, एकता के सूत्र में बाँधने का भाव रखती है..विश्व कल्याण के लिए उपासना करती है...
इस वर्ष यह पर्व सदियों से प्रसिद्द अपनी उसी भव्यता के साथ हरिद्वार में मनाया जा रहा है...महाकुम्भ 2021
(Mahakumbh 2021) जो पूरे विश्व का आह्वान करता है.. दिव्य स्नान के लिए।। 
इसकी भव्यता से तो हम सब परिचित ही हैं लेकिन क्या हम जानते हैं..इस पर्व के पार्श्व की कहानी ..इस पर्व का इतिहास ...
तो आइये जानते हैं कुम्भ के बारे में लगभग सबकुछ थोड़ा थोड़ा..आसान भाषा में... 

'कुम्भ "इस पर्व का ये नाम क्यों ?
इसके उत्तर में जाने से पहले हमें यह जाना होगा कि इस शब्द का अर्थ क्या है.. 
कुम्भ का अर्थ है कलश या कोई पात्र कह लीजिये अमृत से भरा हुआ..

अब समझते हैं क्यों इस पर्व का नाम कुम्भ है..
इसके लिए एक पौराणिक कथा आपको जानना चाहिए..जिसे आधार मानकर यह पर्व मनाया जाता है..
सागर मंथन की कथा से आप सब परिचित ही होंगे..सागर मंथन से कई बहुमूल्य रत्न औषधियां निकली थी ..विष भी निकला था जिसे संसार के कल्याण के लिए शिव जी ने स्वयं उसका पान कर लिया था और कंठ में रोक लिया था क्योंकि उनके अलावा यह सामर्थ्य किसी में न थी ..और विषपान से ही उनका कंठ नीला पड़ गया और वो नील कंठ कहलाये..
इसी मंथन में अमृत का कलश अर्थात कुम्भ निकला जिसे धन्वन्तरी लेकर आये थे  ..
असुरों ने अमृत कलश अर्थात कुम्भ देखते ही उसे पाने के लिए उनके पीछे दौड़ पड़े..धन्वन्तरी ने वह कलश असुरों से बचाने के लिए जयंत को दे दिया ..
और जयंत उसे छिपाने के लिए यहाँ वहां भागते रहे और इस तरह असुरों से बचाने  के प्रयास में चार स्थानों..हरिद्वार ,प्रयाग ,उज्जैन और नासिक में.. कुम्भ से अमृत की बूँदें गिर गयी...जिससे यहाँ नदियों का जल अमृत से प्रभावित हो गया..अब चूंकि उस कुंभ से अमृत बूंदे गिरी थी.. इसलिए इस पर्व को कुंभ कहा गया और स्नान को कुम्भ स्नान 

कुम्भ पर्व मनाना कब से प्रारंभ हुआ और कितने समय में मनाया जाता है ?
   स्वाभविक है कि कुम्भ से अमृत बूँदें गिरने से इन स्थानों का महत्व बढ़ जाता है...
..जहाँ दुनिया से लोग इस भूमि पर उतर कर स्वयं को धन्य करते हैं ..यहाँ स्नान से कष्ट दूर होते है..मृत्यु से भय ख़त्म होता है और हम इस भवसागर से तर जाते हैं ..यही भाव हमें यहाँ इकठ्ठा करता है...और इसके एक विशेष समय निर्धारण से इसे पर्व का स्वरूप मिल जाता है।। 
 अब इसे उत्सव के रूप में मनाने की जो शुरुआत है वो उत्तर भारत के एक प्रसिद्द हिन्दू शासक हर्षवर्धन के काल यानि छठवीं शताब्दी से मानी जाती है ..कहते हैं हर्ष वर्धन ने इस कथा में वर्णित स्थानों पर उत्सव की शुरुआत की थी .. 
हर्ष वर्धन द्वारा प्रारंभ यह पर्व उसके सम्राज्य की एकता और व्यापारिक दृष्टिकोण के उद्देश्य को लेकर था..क्योंकि लोग यहाँ लोग सहज इकठ्ठा होंगे ..और ऐसे पवित्र स्थान में उत्सव का हिस्सा बनेंगे..क्योंकि धर्म में एकजुट करने की क्षमता होती है..और भव्यता देखने के लिए लोगों के और विदेशियों के आगमन से साम्राज्य की आर्थिक स्थिति पर भी अच्छा प्रभाव होगा ...

कुम्भ प्रत्येक स्थान पर बारह वर्ष में मनाया जाता है..
कुम्भ की बारह वर्ष की अवधी को लेकर यह कथा जुडी है कि अमृत को असुरों से बचाने के लिए असुरों से बारह दिनों तक संघर्ष चला था...और वह का बारह दिन इस मृतुलोक के लिए बारह वर्ष के सामान माने गये 
बताना चाहूंगा कुल बारह कुम्भ होते हैं ..जिसमें से चार कुम्भ पृथ्वीलोक में होते हैं..और शेष आठ देव लोक में होते हैं..ऐसी मान्यता है...
..और हम सब दो कुम्भों के बीच में अर्धकुम्भ भी मनाते है ..
आगे चलकर आद्य शंकराचार्य जी का इसके विस्तार और भव्यता में बड़ा योगदान माना जाता है..

कुम्भ योग 
असुरों से अमृत कलश को बचाने के लिए जिन ग्रहों ने प्रयास किया था..उन्ही ग्रहों के एक निश्चित योग से कुम्भ योग बनता है ...यह एक सामान्य उत्तर है ..इस पर और भी ज्योतिष बिंदु होते  हैं जिन पर विचार किया जाता है ..

कुम्भ और अर्धकुम्भ 
कुम्भ      -    बारह वर्ष में 
अर्ध कुम्भ  - छः वर्ष में 

इन समयों में नियत स्थानों पर लोग इकठ्ठा होते हैं ..और एक मेला जैसा हो जाता है ...मेले का व्यापारिक दृष्टिकोण से अलग मूल अर्थ है लोगों का जमाव...इस तरह कुम्भ मेला लगता है..
सभी श्रद्धालु कुम्भ स्नान करते हैं..
मकर संक्रांति के बाद स्नान का योग माना जाता है क्योंकि ऐसी मान्यता है कि इस समय स्वर्ग लोक के सभी द्वार खुले रहते हैं...और लोगों में मुक्ति की आकांक्षा की पूर्ति होती है..

इस वर्ष कुम्भ 
इस वर्ष यह आयोजन हरिद्वार में होने जा रहा है...इससे पहले यहां यह पर्व 2010 में हुआ था..
इस वर्ष कोरोना के कहर के चलते हम सब की सुरक्षा के लिए online रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया है ..जिसके विषय में आप अधिक जानकारी सर्च कर सकते हैं ..
तो आइये, इस आस्था के भव्य आयोजन का हिस्सा बनें..मोक्षदायी स्नान करें..
विश्वास है आपको यह ब्लॉग कुम्भ के विषय में जाने में कुछ सहायक रहा होगा..
मिलेंगे फिर किसी विषय पर चर्चा के लिए ..
धन्यवाद।।