।।धन्यवाद उत्कर्ष।। 

"सर, मेरे यहाँ कार्यक्रम है
और आपको आना ही है
मेरा गाँव आपके गाँव से अधिक दूर नही है। 
मिलना चाहता हूँ आपसे। 
मैं आपको कार्ड भी देने आऊंगा।"
यह स्नेह भरी जिद थी उत्कर्ष की।। 😊😊
अभी ग्यारहवीं में हैं।लेकिन साहित्य विधा में बहुत रुचि है।
सोशल मीडिया के माध्यम से उत्कर्ष हमेशा रचनाएँ सुनाते रहते हैं। 
सुनता रहता था। उन्हें पता चला होगा कि गाँव उनके गाँव से चालीस पचास km के अंतर पर ही है तो उन्होंने उनके यहाँ होने वाले भागवत कथा कार्यक्रम को मिलने का बहाना बनाया।। 
यदि मैं न जाता तो बाल मन के इतने स्नेहिल भाव को सामने से देख नही पाता।। 
मैं कोई बड़ा चर्चित या ऐसी कोई उपलब्धि वाला नही हूँ 
लेकिन उत्कर्ष का मेरे लिए यह प्रेमभाव.. 
मिलना जरूरी था।। उसका विश्वास नही टूटना चाहिए था।। 
बस यह विचार करके मैंने भागवत कार्यक्रम में तो नही लेकिन उससे पहले ही उनसे मिलने की योजना बनायी क्योंकि तब तक गाँव में रहना निश्चित नही था। 
मैं और मेरे डॉक्टर चाचा जी को चलने के लिए राजी किया।बाइक उठायी और चल दिया रीवा से प्रयागराज के रास्ते।। 

लगभग दो घण्टे में उनके घर पहुंचे। उत्कर्ष बाहर ही इंतज़ार कर रहे थे। 
इतनी विनम्रता इतने ढंग से स्वागत। 
इतनी कम उम्र में ये परिपक्वता उनके घर का परिवेश बता रही थी।
फिर लगभग दो तीन घण्टे बैठा। उत्कर्ष ने कविता सुनायी। उनके सहज प्रश्न जो शायद उनकी उम्र में मेरे लिए भी बड़े कठिन रहे होंगे। बातें की।। 
उनके मामा जी से भी मिलना हुआ। उनकी संपन्नता बड़ी गंभीरता,विनम्रता और सहजता लिए हुए थी। बहुत अच्छा लगा।। दोपहर का खाना हुआ। हालाँकि आवश्यकता नही थी लेकिन मना करने का कोई विकल्प नही रखा गया था। 
ह ह ह.. ये कहना ही होगा कि अतिथि तो मैं बस उत्कर्ष का ही था लेकिन सारा माहौल उनके घर वालों ने भी संभाला हुआ था।😊😊।ताकि उत्कर्ष परेशान न हों। उत्कर्ष और उनकी छोटी बहन ने खूब ध्यान रखा।।उनके भाई जो CDS की तैयारी कर रहे हैं।। अच्छा लगा बात करके।😊। 
बस इतनी सी ही यात्रा थी।।। 
बहुत आनंद आया।।सोचा इसे इस तरह लिख लें।। 
कभी जब पढूंगा वही एहसास फिर मिल सकेगा।। 
बहुत आनंद आया उत्कर्ष जी।। आपका नाम आपके काम का शीर्षक बने। इन्हीं शुभकामनाओं के साथ।। 
धन्यवाद।।।। ⭐💐🙏😊❤

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