मैं यह चौपाई अक्सर दोहराता हूँ.. 

अब मोहि भा भरोस हनुमंता। 

बिनु हरिकृपा मिलहिं नहि संता।।

आज बड़ा सौभाग्य का दिन रहा कि पुस्तक उन तक पहुंचाया।। जिनका मेरी पुस्तक में ही नहीं जीवन के कई पक्षों में भी मार्गदर्शन मिलता रहा..

चौहान सर का सानिध्य मिलने की घटना कुछ इस तरह थी -

एक बीस वर्ष का लड़का कॉलेज के सांस्कृतिक कार्यक्रम में कविता वाचन में अपना नाम देने जाता है। चौहान सर उस कार्यक्रम के प्रभारी थे..


वो कविता मांगते हैं। पढ़ते हैं..कविता के भाव शायद उन्हें प्रभावित किये हों लेकिन लेखन में कई त्रुटियाँ खोजते हैं। वो कोई साहित्यकार नहीं है लेकिन उनके द्वारा तैयार की गयी आपकी जांच रिपोर्ट  आपको किसी विषय विशेष के पारखी से कम नहीं लगेगी।।

आगे उन्होंने मैं इसे कैसे पढूंगा ये पूछते  हैं और सबसे सुनी प्रशंसा से डूबा उतराया मैं उनके सामने तनकर 

कविता वाचन करता हूँ। 

और इस दिन उनकी कही गयी बातें कविता ही नहीं जीवन के कई पक्षों में आज समझ आती हैं।मार्गदर्शन करती हैं..

वाचन में न जाने कितनी अशुद्धियाँ।।कविता निरुद्देश्य। मात्र मनोरंजन को केंद्रित।।

 यह सब लेकर उनके समक्ष इस तरह खड़ा था जैसे मुझसे कोई बेहतर नहीं।।


तो यह सर से मेरी पहली मुलाकात थी..

अब कुछ बातें 

एक बात जिस पर मैं स्वयं पर गर्व कर सकता हूँ कि उनकी डांट के बाद भी पूरे कॉलेज से शेष वर्ष उनका पीछा नहीं छोड़ा ।मैं जानता था कि यदि यह मैं सीख पाया तो बहुत काम आएगा ।  

उन्होंने जीवन में खूबियों के रास्ते ही सिखाये। ..मैं न कर पाया होऊं ये मेरी असमर्थता हो सकती है..

कमियां सिर्फ मेरी हैं।उन्होंने सही राह ही दिखायी।। 

वो कॉलेज के पुस्तकालय विभाग के प्रमुख थे..

जब अवसर मिलता।जाकर उन्ही के पास खड़ा हो जाता।।बहुत कम ही साथी उनके पास टिक पाते थे..

दरअसल उनकी खूबी ये थी कि वो सबसे ऐसे ही थे। .जिसको सीखना हो सीखे न सीखना  हो तो न सीखे।पर जहाँ लगता था कहते थे.. मैं तो टिका रहा। .

और फिर इस सानिध्य में सबसे पहले व्यर्थ अभिमान जो आता है हममें वो छट गया जीवन में किसी भी उपलब्धि को लेकर।यह सुनी बात बेहतर समझ आयी कि कुछ भी कितना बेहतर क्यों न हो उससे बेहतर किया जा सकता है। . .

कविता वाचन में उच्चारण और स्थिरता का महत्व।।यह सब आपने समझाया।पता नहीं मैं कितना कर पाया। .लेकिन अभ्यास में हमेशा रखा..

मेरा कॉलेज की पढ़ाई पूरी होने के बाद भी , उनके सेवानिवृत के बाद भी मैं उनके संपर्क में रहा.. मुश्किल  में प्रेरणा मिलती थी..

सर आपने केवल सिखाया।। कोई कर पाए न पाए वो जाने।।

इस पुस्तक में आपसे मिला मार्गदर्शन बहुत उपयोगी रहा है। जो नहीं कर पाया।। सुधारता रहूंगा।।

कल, पुस्तक भेंट करने के लिए आपके यहाँ आकर बहुत अच्छा लगा।बेटे की तरह आपका स्नेह मिलता है..वैसे  यह तो गुमान सदैव कर सकता हूँ कि  इतना तो कर पाया कि आपके मन में यह भाव ला पाया कि आपकी सुनता तो हूँ और करने का प्रयास करता हूँ और शायद यही आपके विशेष स्नेह कर मार्गदर्शन का कारण है.


कई घंटे बातें हुयी।।मैं सर के सामने वो कॉलेज वाले लड़के की तरह मियां मिट्ठू बनता रहा... अच्छा लग रहा था। .जहाँ आप सहज छोटे हो जाते हो उम्र और अनुभव में। .और वो बाल मन गाये जाता है छोटी छोटी उपलब्धियां ..जैसे कोई नदी समुद्र के सामने।।


अभिराज भैया,पूजा भाभी सबसे मिलकर बहुत अच्छा लगा..आप सब छोड़ने आये..मुलाकात तो होती रहेगी लेकिन प्रथम स्नेह स्मृति में रहना चाहिए।आप सबमें सर ने अपना प्रभाव छोड़ा है.. 

एक बार फिर प्रणाम सर ,बहुत आभार मार्गदर्शन के लिए। हमेशा इसकी आवश्यकता रहेगी।।।आप हमेशा स्वस्थ रहें यही कामना है। .

कोई आपको यूँ ही नहीं मिलता। समय का बड़ा उद्देश्य होता है । इसीलिए शुरुआत में गोस्वामी तुलसी दास की वो चौपाई रखी..

धन्यवाद् 

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