Thursday, October 25, 2018

जाना है मिलने तारों के घर...Read My First Poem (2009)


                                                                                                   
जब आप एक लम्बे समय के बाद किसी अपनी ही चीज को देखते हैं तो कितने भी व्यस्त हो आप एक पल ठहरते जरुर हैं रुकते हैं उसे देखते हैं और कोशिश करते हैं याद करने की...कि वो आपको कैसे मिली थी किसने दी थी ...यही सवाल आते होंगे 
और इसी तरह जब आप कोई अपनी रचना, अपनी कृति देखते हैं तो हम याद करना चाहते  हैं  कि हमने इसको लिखते वक्त क्या सोचा था या  कैसे ये कविता दिमाग में आयी थी ... 
और यह भी महसूस करते होंगे कि वो आपकी पहली कविता जिसको लेकर उस वक्त आप स्वयं को बड़े रचनाकार समझ रहे थे  आपकी आज की कविताओं के सामने  कोई स्तर नही रखती, आपकी आज की रचना की तरह उसमे उतनी परिपक्वता नही है... 
लेकिन ये भले हो कि अब आपके शब्द, विचार समय के साथ  अधिक स्पष्ट हो गये हों..लेकिन ये सोचकर आप जरुर मुस्कुराते होंगे कि आपको इतनी बड़ी दुनिया का रास्ता... इसी मासूम, टूटे फूटे शब्दों की रचना  ने  खोला था ...आपके इन्ही विचारों से  ..
ओह्ह ...बड़ी लम्बी बात हो गयी ....हाहाहा.. जबकि बात बस इतनी थी कि मै आपसे अपनी पहली कविता शेयर करना चाहता था ..जो मुझे कुछ महीने पहले अचानक से करीब 10 साल बाद मिली ..मुझे तो भूल ही गयी थी ..

कविता कुछ इस तरह थी ..

जाना है मिलने तारों के घर 
मिलना है उनकी रानी से ..
पूछूँगा कहाँ पे राज तेरा 
बतला कैसा है ताज तेरा.. 
जाऊँगा बस कुछ दिन में ही 
बस,बर्फ के हिमशैल से 
मेरे अंग निकल आने दो.. 
चढ़ना है सफलता की सीढ़ी,
मेरे अरमानों के ज़रा पंख निकल आने दो ...

सूरज से भी जाना है मिलने 
बस वही कुछ पूछने.. 
कहाँ है चमकता अगन सा वो 
हार है किस छोर में.. 
जाऊँगा बस कुछ दिन में ही 
ज़रा सी तपती अगिन से 
मेरे अंग दमक जाने दो.. 
चढ़ना है सफलता की सीढ़ी 
मेरे अरमानों के ज़रा 
पंख निकल आने दो ....


धरती के भी जाना है नीचे 
थोडा वहां भी काम है.. 
मिलना है उन परदेशियों से 
पूछना क्या हाल है.. 
नाम भी पूछूँगा  मैं बस ,
मुश्किलों से जूझकर ,
इरादों को संभल जाने दो ..
चढ़ना है सफलता की सीढ़ी 
मेरे अरमानों के ज़रा, 
पंख निकल आने दो ...

                           -  संदीप  द्विवेदी
नमस्कार ..शुभकामनाएं 


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