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 किसी एक को नही  हम सबको चाहे हम सब विद्यार्थी हों, व्यवसायी हों, एम्प्लॉयी हों को याद रखने वाली बात है 
अपने काम को पूरी लगन और प्रेम से करना। 
 यदि हम अपने काम से प्रेम नही करेंगे तो सीधी सी बात है काम भी हमसे यही भाव रखेगा.. 
हम सबने ये कहावत अपने बुजुर्गों से सुनी होगी कि काम ही हमें सम्मान दिलाता है। 
हमारे भीतर जिम्मेदारियों (responsibility) को पूरे मन से निभाने का भाव होना चाहिए.. 
हमें अपने उत्तरदायित्व के प्रति दृढ़ होनी चाहिए, उसके लिए समर्पण होना चाहिए । 
जिनमें भी यह समर्पण रहा उनमें ही संभावनाएं हैं। 
...और यह समर्पण हमें सरदार पटेल जी के जीवन (life) में क्या खूब देखने को मिलता है ..
उनके जीवन की एक बड़ी चर्चित घटना है...
कहीं पढ़ा था कहते हैं कि एक बार सरदार पटेल जी किसी केस पर बहस कर रहे थे जिसमें उनके मुवक्किल को फंसाया गया था .. और जिसमें उनके हार जाने के बाद उनके मुवक्किल को कठोर सजा होने वाली थी ..
 अदालत में बहस जारी थी..बात विवाद चल रहा था ... तभी उनको एक टेलीग्राम आया । 
सरदार पटेल जी ने पढ़ा..कुछ सेकंड के लिए अचानक रुके ..और फिर उन्होंने उस टेलीग्राम को जेब में डाला और अपने काम में जुट गये .. 
और जब यह बहस पूरी हुई तब उनके एक मित्र ने जो उनके पास ही बैठा था...उसने सरदार पटेल को टेलीग्राम पढ़ते हुए उनके चेहरे पर उभरे कुछ क्षणों के लिए दुःख के भाव को देखा था। 
 उसने पूछा- क्या टेलीग्राम था पटेल जी ? 
सरदार पटेल जी ने उनकी तरफ देखा और कहा - मित्र ,मेरी पत्नी की मृत्यु हो गयी है ...
 उनका मित्र चौंक गया ..क्या ?
उसने आश्चर्य से पूछा -फिर भी आप बहस कर रहे थे ...जा नही सकते थे ..? क्या आपको आपकी पत्नी की मृत्यु का दुःख नही हुआ ? बहस छोड़ भी तो सकते थे ? इतनी जरुरी थी बहस ?
  एक साथ अनेकों ऐसे सवाल उस मित्र ने सरदार पटेल जी से पूछे। 
 सरदार पटेल जी ने मित्र को जो जवाब दिया वो एक बड़ा सन्देश देता है उन्होंने कहा - 
 क्यों, दुःख नही हुआ पर क्या बहस बीच में बंद करके मैं अपने मुवक्किल को फांसी पर चढवा देता.. अच्छा, अब जाने दो मुझे.. 
उनका मित्र उनके काम के प्रति इतना समर्पण.. वो उन्हें देखता रह गया.. 
तो ये होता है काम के प्रति प्रेम.. 
यह किस्सा हमेशा याद रहना चाहिए हम सबको । 
हमारी सफलता..हमारे काम के प्रति समर्पण हमारे कर्त्तव्य बोध(responsibility) पर निर्भर करती है .. 
जो भी काम हो बिल्कुल अपना समझ कर करें वही काम आपको हमें एक बेहतर स्थान देगा। 
हो सकता है हमें काम मन का न मिला हो लेकिन यदि फिर भी यदि आप कर रहे हैं करना ही पड़े तो भी उसे वैसे ही मन से करें । जैसे आप अपने मन वाला करते।
देखियेगा आपको वो काम हारने नही देगा। निराश नही होने देगा। 
...तो आइये, अब से ठान लें जो हमारा काम है हम उसे पूरी लगन के साथ करेंगे ..
 धन्यवाद् 
 फिर मिलेंगे कुछ नया लेकर...

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