आज अकेले राह चला तो 

दिल में बढ़ते भार से जाना 

तुम्हें छोड़ना कितना मुश्किल 


हाथ हमआर भूल चुके हैं 

हाथों को बिन थामे चलना 

दुनिया तो एकाकीपन है 

दुनिया तेरे साथ टहलना 

तेरी याद में राहें भटका 

रहा नहीं जब अपने बस का 

मन के सूनेपन से जाना 

तुम्हें छोड़ना कितना मुश्किल 


तुमसे मिलना समय रोकना 

दोनों जैसे एक जैसा है 

उम्र ने गिनती बदली लेकिन 

जैसा था सब.. सब वैसा है 

जब दिखा कहीं भी सिरा नहीं

पलकों के गीलेपन से जाना 

तुम्हें छोड़ना कितना मुश्किल 


गंगा के पानी के छींटे 

तुम्हें जो मुझपर फेंके थे 

पावन प्रेम लिए पावन जल 

तन मन के रस्ते छेंके थे 

घाट दूर तक नजर न आया 

कुछ यूं डूबा मन तब ये जाना 

तुम्हें छोड़ना कितना मुश्किल 

- संदीप द्विवेदी 

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