एक परिवार का आमंत्रण और मेरी यादगार रतलाम यात्रा ..memorable journey ; kavi sandeep dwivedi


बशीर बद्र साहेब की एक शेर  याद आ रहा  है
तमाम रिश्तों को मैं घर पे छोड़ आया था,
फिर उस के बाद मुझे कोई अजनबी नहीं मिला।
 
कितनी गहरी और सटीक बात है न..अगर हमें समझ आ जाये तो...
 यूं तो शायरी मैं नही लिखता  लेकिन पढने का शौक़ रखता हूँ..और बद्र जी जैसे शायर जो दो लाइन में दुनिया समेटते हैं..कौन नही पढना चाहेगा..
ओह्ह..कहाँ बात पहुच गयी ऐसे बोल रहा हूँ जैसे आपको पता ही न हो...सब मैं ही जानता हूँ ..ऐसा नही है बस उत्सुकता भी होती है कुछ बातें..ये  जानते हुए कि आप भी जानते हैं...फिर भी कई बार बोलने की ..
       वैसे ये ऊपर की  लाइन्स क्यों लिखी..पूरा ब्लॉग पढकर आपको समझ आयेगा..

पिछले  दिनों (9 March 2019) मेरा रतलाम जाना हुआ..

मध्यप्रदेश को दो राज्य सीमा गुजरात और राजस्थान से जोड़ता हुआ जिला शहर .. 
वहां के एक बड़े ही सभ्य व्यावहारिक दीक्षित परिवार ने मुझे आमंत्रित किया था..
किसी कविता पाठ के लिए नही...बस जितना कुछ उन्होंने मुझे ऑनलाइन सुना था ..साहित्य में रूचिवश उनका शायद एक अपना लगाव था..मैं उनकी भावना का सम्मान करता हूँ..सम्मानीय मेम और उनके दो बेटे दिव्यांशु और प्रभात 
              कहना ये चाहता हूँ इस तरह से स्वागत इतना प्रेम इतना स्नेह उनके पूरे परिवार का..अविस्मर्णीय..
उनके घर में भगवान् की रोज की जाने वाली पूजा देखी..और वो देखा जो मैं अपने घर में मेरे दादा जी को करते देखता हूँ..और जो अब कहीं समय के साथ खो रहा है.... घर में कुछ भी बने ,कुछ सामान आये वो सबसे पहले पूजा घर में भगवान् के पास थोड़ा वक्त रखा जाता है ..मुझे बहुत प्रभावित किया..



वहाँ पहुचने पर वक्त इतना तेजी से बातचीत में निकल गया कि जाते तक लगता रहा अभी अभी आया था...

तलाम से मेरा एक पुराना खास जुडाव है..
लंच हुआ और फिर उस दिन की शाम को दिव्यांशु के साथ घूमना शुरू किया..
मेरा रतलाम जाना दूसरी बार था लेकिन ये दूसरी बार पूरे सत्रह अठारह वर्ष का अंतर रखता था ..
सन 2002-2003 में... मेरे चाचा जी की जॉब वही थी वो एक निजी कंपनी में मशीन ऑपरेटर पद पर थे..शहर में पढने के लिए गाव से पहली बार उन्ही के पास गया था..करीब एक साल रहा..फिर किसी वजह से वापस गाँव जाना पड़ा..
    अब सब बदल चुका था वो विद्यालय अब बंद हो चुका है..और कुछ इस तरह है..सब कुछ मैं कैमरे में कैद करना चाहता था..





और फिर आसपास पता करने पर सर का नंबर मिल गया जिनकी ये विद्यालय थी..मुझे बहुत मानते थे..mathmatics पढ़ाते  थे तब वो 30 साल के थे अब हिसाब कर लीजिये 18 साल ..
      बात हुयी और बस..फिर एक बुके लेकर उनसे मिलने पहुँच गया..वो अब एक प्रशासनिक अधिकारी हैं..हाईकोर्ट रतलाम में सीनिअर एडवोकेट हैं...बहुत  प्यार दिया और आश्चर्य हुआ कि उन्हें मैं याद था ..और वो हमें ऑनलाइन सुनते भी थे ...करीब एक घंटे बातें हुयी...मुझे तो उस समय की उम्र की अपरिपक्वता से कुछ भूला भी रहा होगा..लेकिन सर को बहुत याद था..अठारह साल पुराने दौर में जाकर लौटा..खुश था उस समय का काफी कुछ ढूढ़ लिया था ..जैसे जहाँ रहता था..जिस दुकान से गुल्ली डंडा खरीदता था..



और फिर......हम रतलाम का राममंदिर घूमते हुए वापस घर आये करीब 10 बज गये थे..डिनर हुआ..बातें इतनी शामिल थी डिनर में भी कि घंटों लग गये..और फिर करीब 1 बजे तक सभी लोग कुछ मूवी की कॉमेडी बाते करते रहे..हसकर पेट दर्द करने लगा ..दिव्यांशु ने अपनी शैक्षणिक अचीवमेंट दिखायी .. 

        अगले दिन 10 मार्च 2019 को उनके परिवार ने मेरी घूमने  की इच्छा को बगैर कहे ध्यान में रखा और फिर बस  मैं ही नही सभी लोग घूमने निकले..उन्होंने एक कार हायर की और रतलाम ही नही... इसके आसपास के जितने भी फेमस प्लेस थे ...सब जगह घूमें..कालका मंदिर ,सैलाना की गढ़खंखई मंदिर ,कैक्टस गार्डन JVL टेम्पल ,महाकेदारेश्वर मंदिर कई जगहें...मैंने इतना कुछ नही सोचा था..पता भी नही था..

कुछ तस्वीरें 











पूरा दिन बीत गया..शाम को मुझे निकलना था..लेकिन सुबह जाने को कहा गया..
बाहर होटल में डिनर के लिए गये.. हम सब थके हुए थे लेकिन 12 बजे तक बातें चलती रही..मेम ने कई राधा कृष्ण,महाभारत से जुड़े कई रोचक प्रेरक किस्से सुनाये..मैंने भी ऐसे ही कुछ सुनाता रहा जो सबने कहा.. मैं कोई कवि लेखक के तौर पर बुलाया गया हूँ..वो गंभीरता तो भूल ही गया था सब भाइयों के साथ...मैं जो था वही था...

"मैं जिन्दगी को 60 से 70 के साल के एक खेल के  तौर पर आंकता हूँ ..जीवन की जीत हार में  एक परंपरागत उतार चढाव देखता हूँ ..मेरे कोई खास और ऐसे नियम नही हैं जो मुझे जरुरी हैं..मैं इस बात का ज्यादा पक्षधर हूँ कि जिंदगी चलना ही है गुजरना ही है ये मेरे हाथ नही है ..लेकिन ये हाथ में है की क्यूँ न इसको ऐसे ऐसे मोड़ दिए जायें कि जब कुछ याद करूँ तो ये सोचूं क्या लाइफ है.."

हा हा हा .बहुत ज्ञान हुआ..ऐसे ज्ञान और ज्ञानी हम सबके व्हाट्स एप में चलते रहते हैं..यही सोच रहे न ..जी मैं भी..हा हा 
और फिर उन्होंने मेरे जाने पर देने के लिए इतना सब उपहार लेकर रखे थे मैं देखता रह गया..संकोच भी लग रहा था..उनके उपहार में जो एक उन्होंने मेरे लिए स्मृति चिन्ह दिया वो अमिट छाप छोड़ गया..किसी के लिए इतना खास...

सुबह जल्दी निकलना था तस्वीरें याद के रूप में रात में ही ले ली गयी..



और इस तरह अगले सुबह 10 बजे जाने का वक्त आ गया..दो दिन कैसे गुजरे पता ही नही चला था..
कोई भी सम्पन्नता इस तरह के प्रेम के आगे फीकी है..मैं पूरे दीक्षित परिवार का धन्यवाद् और सम्मान करता हूँ ..और ये कहते हुए ये ब्लॉग टॉपिक यहीं समाप्त करता हूँ ..कि सच में मेम आपने आपके परिवार ने मेरे जीवन के दो दिन मेरे सबसे भावुक और यादगार क्षणों में शामिल कर दिए..आपने सबको बहुत अच्छे संस्कार दिए हैं..
जहाँ तक रहा मुझे कैसा लगा आपके यहाँ आकर तो यही कहूँगा... पूरा घर आपने मंदिर जैसा बनाया हुआ है..और मंदिर में किसे अच्छा नही लगेगा..
धन्यवाद\..
तो अब समझ आया ?क्यों लिखी थी ऊपर की लाइन्स..
हा हा हा.. नमस्कार 

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